शनिवार, 17 अप्रैल 2010

चमचागिरी परमो धर्मः, सोच रहे होंगे मैंने शीर्षक क्यों चुना लेकिन क्या करूं दोस्तों जिधर देखता हूँ ऐसे ही लोगों की भीड़ नज़र आती है जिसने मुझे इसे चुनने पर मजबूर कर दिया। शुरुआत में जब कुछ चम्मच टाइप के लोगों को देखा तो लगा की इनसे बड़े चमचाकार का दर्शन फिर शायद किसी विशेष नक्षत्र में ही हो लेकिन जैसे जैसे आगे बड़ा एक से बढकर एक प्रतिभाएं सामने आयें। इनमे कुछ तो ऐसी थी जो सोते वक़्त या यु कहे तो हर पल सासटांग खड़े रहते थे। बॉस दिन को कहे रात तो सूरज को बेकार बल्ब कहने का अभियान चला दें। बॉस कहे तो उलटे खड़े हो जाएँ तो भी कोई संकोच न हो। बॉस कहे तो बीपों-बीपों कहते हुए गधे को बाप कहें। बात चली है तो एक ऐसे ही चम्माचाकर श्री श्री श्री एक हज़ार आठ की याद आती है। संयोगवश ऐसे तेजश्वी ओजस्वी महापुरुष का सानिध्य मुझे अपने पढाई के दौरान ही मिला लेकिन मैं अग्यानी उन्हें पहचान नहीं पाया। हालांकि पूत के पाँव पालने में ही दिख जाते हैं और श्री श्री ने भी इसे कहावत को पूरी तरह से चरितार्थ किया। भले ही पढाई के दौरान बॉस न रहा हो लेकिन चम्मच धर्म का निर्वहन करना ही था सो बन गए गुरूजी के चम्मच। गुरूजी कहें 'मैं अमेरिका गया था तो श्री श्री चिल्लाएं 'हाँ सर क्लिंटन के बगल में आपको टीवी पर देखा था। गुरूजी भी खुश और चम्मच धर्म का पालन भी हो गया। गुरूजी का जन्मदिन एक महीने बाद हो तो श्री श्री एक महीने पहले ही जन्मदिन की पार्टी दे देते थे। जेब में पैसे न हो तो भीख मांगने से भी गुरेज नहीं। ......

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