शनिवार, 16 अक्टूबर 2010

रियली जाग गई आशाएंक्रिकेट, सिनेमा और क्राइम इन दिनों इन 'इन थ्री सीÓ से जुड़ी खबरों का ही जलवा है. फिर चाहे वह कोई दबंग टाइप न्यूज चैनल हो या फिर छुटभैया, हर जगह मैक्सिमम टाइम इन्हीं से रिलेटेड खबरें चलायमान होती हैं. क्रिकेट से छूटे तो क्राइम और क्राइम से आगे बढ़े तो सिनेमा, इसके अलावा इन चैनल्स पर कुछ दिख जाए तो इसे अपनी खुशकिस्मती ही समझिए. आज मैं इन्हीं 'सीÓ में से एक सिनेमा की बात करने जा रहा हूं. जिस तरह की मूवीज इन दिनों ब्लॉकबस्टर वाली हिट लिस्ट में शुमार हो रही हैं उससे तो यही लगता है कि विशुद्ध मसाला फिल्मों का दौर फिर से लौट आया है. फिर चाहे उसमें बे सिर-पैर के एक्शन हों या फूहड़ गाने, इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता. एंटरटेनमेंट के लिए कुछ भी परोसेगा वाली मेंटैलिटी वाले निर्देशकों ने भी दर्शकों के इस टेस्ट को बखूबी पकड़ लिया है. यही कारण है कि दबंग और वांटेड जैसी मूवीज हिट होती हैं और बॉलीवुड के सबसे प्रतिभाशाली निर्देशकों में शुमार किए जाने वाले नागेश कुकुनूर की मूवी आशाएं बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिर पड़ती है. दर्शकों को वह मूवी तो पसंद आती है जिसमें एक नायक सैकड़ों खलनायकों को एक साथ पीट-पीटकर अधमरा कर देता है. हालांकि उस मूवी को वह सिरे से नकार देते हैं जिसमें मौत के मुंह में खड़े लोगों के जीवन के दर्द और उनकी इच्छाओं को पूरा करके संतुष्टि पाने वाले नायक को दिखाया जाता है. समझ में नहीं आता कि आखिर ऐसा क्यों है? रियलास्टिक मूवीज का ये हश्र देखकर दुख तो होता ही है, साथ ही उन्हें फ्लॉप का तमगा दिलाने वाले दर्शकों की सोच पर तरस भी आता है.

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